वो खडा सीमाओं पे |
मौन हैं खड़े ये पर्वतों के शिखर,
मौन हैं वादियों के झरने |
वो खड़ा सीमाओं पे सहता,
मौन वर्फीली वादियों के झरने ||
पूजता थाल वो देश की मिट्टी का चन्दन लगा,
झुकता उनका शीश देश की सरहद का वन्दन लगा,
बहाता आंसुओं को मोती बना वतन के नाम पर,
देश की सरहद घर बना सजाता पेड़ चन्दन लगा,
झर उठते एहसास उनके देश पे,
मौन हो वादियों के झरने ||
वो खड़ा सीमाओं पे -------
कतरा- कतरा खून अपना निछाबर करता देश के नाम,
खुशियाँ बेच सीमा पर करता दुश्मनों के काम- तमाम,
जीने की उम्र कोई होती नहीं ममता भी ये रोती नहीं,
लिखता वह खत अमर हो जाऊं बस तेरे देश के नाम,
लड़-खडा, थर-थराएँ न होठ वर्फ में,
मौन हो वादियों के झरने ||
वो खड़ा सीमाओं पे -------
पोंछता छलके आंसू माँ के विदाई ले जब घर से चला,
बहन भी खड़ी रो बांधती -कलाई राखी ले घर से चला,
सिसकती देहरी- दूर खड़ी सुहाग-सिन्दूर न बिछुड़े मेरा,
बिटिया का प्यार गोद ले उठा- रोया जब घर से चला,
मेरा घर- मेरा वतन, वो प्यार ले सोचता,
मौन ये वादियों के झरने ||
वो खड़ा सीमाओं पे -------
सोचूँ लौट चलूँ माँ की जन्म- भूमि मन जीवन की धारा,
छोड़ा जब से आंगन विचलित है मन बहती निर्मल धारा,
अश्रु बहाते छोड़ा जिनको उनकी स्मृतियाँ जिनसे दूर हुआ,
रंगी हुई दीवारें जिनमें खेली होली बिटिया का रंग सारा,
माँ में मात्र - भूमि का आंचल पा सोचूँ,
मौन इन वादियों के झरने ||
वो खड़ा सीमाओं पे -------
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