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Thursday, December 2, 2010

अतीत बनाम भविष्य

कलियों को खिलते हुए देखा था,
कलियाँ तो अब भी खिलती है,
पर हमने खिलना छोड़ दिया|
फूलो को मुस्कुराते हुए देखा था,
फूल तो अब भी मुस्कराते है,
पर हमने मुस्कुराना छोड़ दिया|
चमन को महकते हुए देखा था,
चमन तो अब भी महकता है,
पर हमने महक लेना छोड़ दिया|
चिड़ियों को चहचहाते हुए सुना था,
चिड़ियाँ तो अब भी चहचहाती है
पर हमने कलरव सुनना छोड़ दिया|
कलियों का खिलना,फूलो का मुस्कराना,
चमन का महकना,चिड़ियों का चहचहाना
महज एक इत्तिफाक रह गया है
हम तो बस
एस वीराने में कहकहों की गूँज को तरसते
आशियाने को खोजते चलते चले जा रहे है
मंजिल कही तो होगी
कभी तो मिलेगी
जहाँ पहला जैसा आलम होगा
पैगाम जिंदगी का
चलते चलो, बढते चलो,
रुको नहीं, डरो नहीं
अतीत ही तो बनायेगा
एक सुंदर सुखद भविष्य जो
जीवन को महकयेगा,खिलायेगा और प्रगतिशील बनायेगा |