Thursday, December 2, 2010

लज्जा (तस्लीमा नसरीन) उपन्यास

“लज्जा” की शुरुआत होती है ६ दिसम्बर १९९२ को बाबरी मस्जिद तोड़े जाने पर बांग्लादेश के मुसलमानों की आक्रामक प्रतिक्रया से| वे अपने हिंदू भाई-बहनों पर टूट पड़ते है और उनके सैकडों धर्मस्थलो को नष्ट कर देते है| लेकिन इस अत्याचार, लुट, बलात्कार और मंदिर ध्वंस के लिए वस्तुत:  जिम्मेदार कौन है? कहना न होगा की भारत के वे हिन्दुवादी संगठन जिन्होंने बाबरी मस्जिद को ध्वंस कर प्रतिरोध की राजनीती का खूँखार चेहरा दुनिया के सामने रखा है| वे भूल गए है की जिस तरह भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक है,उसी तरह पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक है|लेखिका ने ठीक ही पहचाना है की ‘भारत कोई विच्छिन्न ‘जम्बूद्वीप’ नहीं है| भारत में यदि विष फोड़े का जन्म होता है, तो उसका दर्द सिर्फ भारत को ही नहीं भोगना पडेगा, बल्कि वह दर्द समुची दुनिया में, कम से कम पड़ोसी देशो में तो सबसे पहले फ़ैल जाएगा | क्यों? क्योकि इस पुरे उपमहादेश की आत्मा एक है, यहाँ के नागरिको का एक साझा इतिहास और एक साझा भविष्य है| अत: एक जगह की घटनाओं का असर दुसरी जगह पर पडेगा ही| अत: हम सभी को एक-दूसरे की संवेदनशीलता का ख्याल रखना चाहिए| ऐसे समाज में ही हिंदू, मुसलमान तथा अन्य सभी समुदायो के लोग सुख और शान्ति से रह सकते है| प्रेम घृणा से अधिक संक्रामक होता है|    

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