Wednesday, August 10, 2011

अब फेसबुक ने बनाई ‘तीसरी दुनिया’

एक नई दुनिया बन कर तैयार हो रही है। यह दुनिया एक दूसरे से मिले बिना एक दूसरे से जुड़ी रहती है। एक दूसरे के सपने, गुस्से और दुख को बांटती है और पल भर में एक दूसरे के साथ जुड़ भी जाती है। यह बात अलग है कि जितनी तेजी से जुड़ती है, उतनी ही तेजी से उन संबंधों को किसी डस्टबिन में फेंक आगे निकल भी जाती है।नए आकंड़े बड़ी मजेदार बातें बताते हैं। अगर दुनिया भर के फेसबुक यूजर्स की संख्या को आपस में जोड़ लिया जाए तो दुनिया की तीसरी सबसे अधिक आबादी वाला देश हमारे सामने खड़ा होगा। अब जबकि आबादी की 50 प्रतिशत हिस्सा 30 से कम उम्र का है, फेसबुक स्टेटस सिंबल बन चुका है। आधुनिक बाजार का 93 प्रतिशत हिस्सा सोशल नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल करता है। भारतीय युवा तो इस नए नटखट खिलौने के ऐसे दीवाने हो गए हैं कि भारत दुनिया का चौथा सबसे अधिक फेसबुक का इस्तेमाल करने वाला देश बन गया है।कोलंबिया यूनिवर्सिटी से आए श्री श्रीनिवासन हाल ही में दिल्ली के अमरीकन सेंटर में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खूब खुलकर बोले। देश के कुछ बड़े कालेजों के छात्रों के बीच उनकी कही बातें फेसबुक के बड़े होते कद को बार-बार साबित करती चली गईँ। एकबारगी तो ऐसा लगा कि जैसे फेसबुक का पीआर ही हो रहा हो। यहां पारंपरिक साधनों का कोई जिक्र नहीं था। यहां फेसबुक एक ऐसे राजा की तरह उभरा जो प्रजा भी खुद है और शहंशाह भी।छात्रों से भरे इस हाल में एक टिप्पणी ऐसी थी जिसने चौंका दिया। एक युवक ने कहा कि फेसबुक को अब बड़ी उम्र के लोगयानी 35 पार वाले भी इस्तेमाल करते हैं। यानी छात्रों को यह मुगालता है कि फेसबुक शायद सिर्फ उन्हीं के लिए ईजाद किया गया और दूसरे 35 से पार वाले लोग बुजुर्ग हैं। यह संकेत एक ऐसे माहौल के तैयार होने का है जहां मुस्कुराहट भले ही हो पर यथार्थ और गरमाहट यहां से नदारद है।फेसबुक जिस आपसी जुड़ाव की कथित जमीन को तैयार कर रहा है, यह उसके खोखलेपन का एक बड़ा सुबूत है। उन्हें फेसबुक की यह दीवानगी उपजी कहां से है और क्यों है। असल में फेसबुक युवाओं के अंदर फैले उस खालीपन को दूर करने का रास्ता है जिसे वे किसी अंधेरी सुरंग में छिपाए रहते हैं। लेकिन यहां एक बात और सोचने की है। हर नई चीज को सिर्फ युवाओं से ही क्यों जोड़ा जाए। क्या फेसबुक सिर्फ युवाओं की ही जरूरत है। नहीं। बड़ी तादाद में बुजुर्ग इस फेसबुक से जुड़ने लगे हैं ( और यहां बुजुर्गों से आशय 70 पार के लोगों से है) और उनका जुड़ना भावनात्मक स्तर पर ज्यादा निश्छल है। यहां किसी इम्प्रैस करने के लिए फेसबुकपना नहीं किया जाता। यहां अपनों की तलाश की जाती है, पोते-पोतियों को भूली-बिसरी लोरियां याद दिलायी जाती हैं और उनसे उनके हाल की खोज-खबर कर झुर्रियों से भरे चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश की जाती है।रिश्तेदार जो अक्सर रविवार की शामों को जमा हो कर गली-मोहल्लों-स्कूलों की पुरानी बातें यादें किया करते थे, वे भी अब इसी फेसबुक पर जमा होकर कागजी धमाचौकड़ी कर लेतें हैं और खुशियां बांट लेते हैं। यह एक बड़ी बात है। अकेलेपन को भोगते बुजुर्गों के लिए यह फेसबुक सपनों का उड़नखटोला बन कर आया है। उम्र के इस पड़ाव पर अपने पुराने दोस्तों को ढूंढने के लिए अब उन्हें बेवजह ही  व्यस्त दिखते अपने बेटों के आगे चिरौरी नहीं करनी पड़ती। वे खुद जब चाहें अपनी पुरानी जड़ों को तलाश सकते हैं और अपने बुढ़ापे में कुछ रौशनियां भर सकते हैं।एक बात और ख्याल आती है। अमरीका जोर-शोर से फेसबुक की बात करता आ रहा है। हम भारत में रहकर भी कभी भी अपने पारंपरिक संचार माध्यमों का वैसा प्रचार कर ही नहीं पाए। भारतीय रेल के एक बड़े अधिकारी अरविंद कुमार सिंह सालों साल डाकिए पर शोध करते रहे हैं और इस पर उनकी लिखी किताब देश की सबसे अनूठी किताब है पर उसका ऐसा प्रचार कभी नहीं हुआ। डाक के डिब्बे और डाकिए के हाथों से मिलती एक चिट्ठी जिंदगी में कैसे रंग भरा करती थी, इस पर भारत सरकार कभी फख्र से झंडे गाढ़ नहीं पाई। पातियों के वे भीगे-महकते दिन अब शायद कभी न लौटें। कबूतर भी शायद कुछ सालों में गुप्त संदेश ले जाने के रास्ते भूल जाएं लेकिन अमरीका याद रखेगा कि फेसबुक और बाकी दूसरे संचार माध्यमों को अधिकाधिक पापुलर कैसे बनाना है। हम सोचते ही रह जाते हैं और बिग ब्रदर हमेशा एक लंबी छलांग भर कर आगे निकल जाता है।
(वर्तिका नन्दा, मीडिया विश्लेषक)

1 comment:

Vaneet Nagpal said...

आपका कहना सही है कि ज्यादातर नवयुवक ही फेसबुक के दीवाने हैं | बुजुर्ग लोग या ३५ साल से उम्र में लोगो के पास या तो वक्त नहीं है या वो इस नई तकनीक को अपनाते हुए इस तकनीक के साथ चलने को तैयार नहीं | या ये भी हो सकता है कि ३० की उम्र के बाद भारत में ज्यादातर आम जनमानस के लिए इस प्रकार का माहोल है कि वो ३० के उम्र का हो जाये तो सभी की ये अपेक्षा रहती है कि वो कुछ कमाने लगे तो घर के खर्चो को बेहतर ढंग से चलाया जा सके | परन्तु नवयुवक के सम्बन्ध वे लोग आत हैं जो या तो २५ की उम्र तक होते हैं या इससे कम उम्र के लोग जिन पर जिमेदारी का कोई बोझ नहीं होता वो अपने विचारों के आदान-प्रदान को ही अपनी जिंदगी मानते हैं और अपने विचारों को खुलकर कहने की आज़ादी को अपना हक मानते हुए ऐसा करते हैं